..... वह वक्त तुम्हारा ....
सूफी ग़ज़ल में जीकर
तन्हाई वक्त को गुजारा है हमने
शाम की मीठी रोशनी में जलकर
कई कई बार यादों को भूला है हमने .............
रात का चादर बिछा
आसमां ने मुंह मोड़ लिया
जलते दीये की लो ने दीप से
अपना दामन कब का छोड़ दिया ..............
वो समझे .............. या ना समझे
था .. हुआ ... कभी .... ये उनकी ही खता
हमने तो पलों में बांटा सब कुछ
दिन दोपहर सभी सालों में गुजारा है .............
" पुष्पा त्रिपाठी "