Thursday, 13 September 2012

.......   एक बात जो मई तुमसे कर लूँ   ......
 
मै कर भी लूँ गर
कोई शिकायत  
ये मेरी हसरत तो नहीं
मै मान भी जाऊं गर
किसी उम्मीद  से अलग
तो ये तुम्हारा प्रमाद  hi सही            ( प्रमाद = नशा,  भूल-चूक,  अन्तः करण की दुर्बलता )
जानती हूँ मै तुम्हे
तुम जमीं पर नहीं
आसमां पर चलते हो
इंशान थोडा होकर
रहते हो
व्यर्थ है तुमसे कुछ कहना
मेरा भाउक हो जाना
कुछ विस्तृत शब्द कहना  
और उसमें गुमनाम बनना
पर इस का तुम्हे  भान कंहा
तुम तो अब भी अनजान रहे
गमों परेशानियों से हमारे
अब भी देख रहे हो जैसे
विस्पष्ट ...  विमुख ... होकर
 
" पुष्पा त्रिपाठी "
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 

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